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Showing posts from October, 2018

आरक्षण - भूपेंद्र सिंह परिहार

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भारत के उच्च संस्थानों की परिजन की अभिमानो की शिक्षा अभी भी इतनी बेकार है की देश में आरक्षण की दरकार है । एक मित्र मेरा सिर्फ नाम लिख कर आया, और उसका CAT का स्कोर कार्ड आया तब मेरे पिताजी ने फ़रमाया थोड़ा सा गुर्राया बोले असफलता यही सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया और तू भी सिर्फ नाम लिख कर क्यों नहीं आ गया अब उन्हें कोन समझाए कि पिताजी ये नेम का नहीं, सर-नेम का खेल है वो मेरा मित्र १२वी दो दफे फेल है उसके पिताजी आपके ही दफ्तर में जाते है और शायद आपसे ज्यादा तन्खवा उठाते है हम हर तरह से लाचार है वो सिर्फ जाती प्रमाण पात्र पर लाचार दिखता है, वो मेरा मित्र, परिहार नहीं, अहिरवार लिखता है । मैं भी उसके पर-दादा पर अत्याचार का विरोध, जताता हूँ, जो हुआ गलत हुआ, संतप्त हूँ, पछताता हूँ. लेकिन मेरे पूर्वजो का बदला मुझ से क्यों, में तो तुम्हारे साथ खेला, एक ही थाली में खाया उसी तालाब में नहाया तुम्हारे दुखों में सरीक हुआ तुम्हारे परिजनों के पैर भी छुआ अब मुझसे ये बंधुआ मजदूरी क्यों क्या मेरी निर्धनता तुमसे छुपी हुई है क्या म...

शिक्षक दिवस - भूपेंद्र सिंह परिहार

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मिट्टी को घड़ा बनाया जिस कुंभार ने रोया कभी तो, लगा वो पुचकारने । गिरा जो जमी पर तो उसने संभाला बढ़ा जो घमंड, तो लगा दुत्कारने । गिलाया, सुखाया, ठोका, बजाया जो सांचे में डाला उस लोहार ने । हीरे के पारखी थे मेरे गुरुजन, जो काटा तो चमका, सारे आकाश में । ममता थी डाली, तो बड़ापन भी डाला समझा के भेजा मुझे क्रूर संसार में । गर मेरी तरक्की से कोई जो खुश है, सर उनका देखो, तुम चलते बाजार में । करी थी तपस्या और खुद ही जले थे दिया था उजियारा उन्होंने अंधकार में । नमन उनको करता हूँ,  मेरे गुरुजन, माफ़ करना जो गलती की हो परिहार ने । - भूपेन्द्र सिंह परिहार

इंजीनियरिंग के दिन - भूपेंद्र सिंह परिहार

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यंहा चार साल लग गए कुछ बदलने के लिए, कुछ नहीं बदला हम ही बदल गए सब सो रहे थे आदतन हूँ ही, उन्हें सोता देख हम भी सो गए माता पिता की उंम्मीदो का सहारा था शक्ल से बेचारा था फर्स्ट ईयर में मुझे अभियंता शब्द पे गर्व था, जैसा भी था उत्साह था, हर्ष था अब तो उस विचार को ही न जाने कितने अर्से हो गए | यंहा चार साल लग गए कुछ बदलने के लिए, कुछ नहीं बदला हम ही बदल गए सब सो रहे थे आदतन हूँ ही, उन्हें सोता देख हम भी सो गए रैगिंग देना, लाइन में खड़े होना बिस्किट नमकीन खाना, सीनियर के लिए सिगरेट लाना पंखे को गाली देना, फंडा क्लियर होना ट्रैन में गाना गाना, थर्ड में सर झुकना इस परिवर्तन से हम खुद ही शर्म खो गए यंहा चार साल लग गए कुछ बदलने के लिए, कुछ नहीं बदला हम ही बदल गए सब सो रहे थे आदतन हूँ ही, उन्हें सोता देख हम भी सो गए गाय का कॉरिडोर में आना, गोबर कर के चले जाना मधुमखियों का भिनभिनाना प्रिंसिपल का चप्पल ले कर दौड़ना टीचरों का कभी कभी पढ़ना दोस्त की बाइक पे हम चार चार सवार हो गए यंहा चार साल लग गए कुछ बदलने के लिए, कुछ नहीं बदला हम ही बदल गए सब सो रहे थे आदतन हूँ ...

कैसे बने अमीर - भूपेंद्र सिंह परिहार

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अमीर बनने के लिए आपको समझनी होगी पर पीड़ा या दिखावा करना होगा समझने का चुनो कोई मुद्दा गरीबी, बेरोजगारी, नारी शसक्तीकरण या अशिक्षा शामिल करो  लोगो को, कि तुम बिन समस्या के शिकार हो, ये जो अनार खा रहे हो, इसी से बीमार हो । बताओ लोगो को, कि वे खुश नहीं है, दो वक्त कि रोटी के लिए उन्हें मेहनत करनी पड़ती है अमीरो को देखो, उनके घर में, सब्जी पूरी पड़ी पड़ी सड़ती है ये अमीर मॅहगी मॅहगी गाड़ियों में तुम्हे चिढ़ाते है, और मेहनत करके तो बैल खाते है, क्या तुम बैल हो? बताओ उन्हें तुम धरती पैर आराम के लिए जन्मे हो तुम्हारे साथ छल हुआ है आवाज उठाओ इन मासूमो कि, पर इन्हे न उठने देना अभिनय करो अपनत्व का, मगरमच्छीय आंशूं बहाओ जैसे भी हो, उन्हें अपने जूठे जाल में फसाओ बताओ उन्हें कि वे स्वतंत्र है, वे जो चाहे कर सकते है संविधान के अधिकार बताओ, पर कर्त्तव्य मत समझाओ बताओ उन्हें कि वे व्यस्क स्वतंत्र हफसी है, उन्हें ऊपर वाले ने वैसा ही बनाया है उन्हें बच्चो के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने का अधिकार है वे ही बस पीड़ित है, ये निठल्ली सरकार है । बताओ उन्हें, कि तुम्हे मजबूर क...

कूदूं या फिर न कूदूं - भूपेंद्र सिंह परिहार

एक अकेली वीरना से, लड़ते लड़ते थक गई, शत्रुओं की भरमार। रक्त की होली खिली, कई सर गिरे, कई धड़ गिरे, जब बरसी, मनु की तलवार । बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ? दो दो बेटे है मेरे, एक अश्व और एक प्राण, दोनों से करती हूँ प्यार । एक क्षण सोचा, कि पीछे मुड़ कर, शस्त्र दाल दूँ, दे दूँ गोरो को अधिकार । बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ? हाय ! यौवन को भी अभी आना था, गंगाधर को मर जाना था, अब जब, जचता है श्रृंगार । क्या ये मेरा युद्ध नहीं है, के सिंधिया, स्वार्थी और समृद्ध नहीं है, मची हुई थी हाहाकार !! बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ? यंहा से नीचे खाई है, उसमें भी गहराई है, पीड़ा होगी अपरमपार ।   मुझमें तो तरुणाई है, बंधू, प्रजा और भाई है, क्या मृत्यु ही जीवन का सार । बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ? मैंने, खून से लथपथ देखे लोग, पराधीन, फिर कैसा भोग, झूठी लगती है जय कार । मातृभूमि का ऋण तो बड़ा है, आज चुकाने ये अश्व भी खड़ा है, फिर मुझको क्या भय, क्या मुझको हार । अब शत्रु सोच रहा था, कि कूंदें या फिर न कूंदें ।