इंजीनियरिंग के दिन - भूपेंद्र सिंह परिहार
यंहा चार साल लग गए कुछ बदलने के लिए, कुछ नहीं बदला हम ही बदल गए
सब सो रहे थे आदतन हूँ ही, उन्हें सोता देख हम भी सो गए
माता पिता की उंम्मीदो का सहारा था
शक्ल से बेचारा था
फर्स्ट ईयर में मुझे अभियंता शब्द पे गर्व था,
जैसा भी था उत्साह था, हर्ष था
अब तो उस विचार को ही न जाने कितने अर्से हो गए |
यंहा चार साल लग गए कुछ बदलने के लिए, कुछ नहीं बदला हम ही बदल गए
सब सो रहे थे आदतन हूँ ही, उन्हें सोता देख हम भी सो गए
रैगिंग देना,
लाइन में खड़े होना
बिस्किट नमकीन खाना,
सीनियर के लिए सिगरेट लाना
पंखे को गाली देना,
फंडा क्लियर होना
ट्रैन में गाना गाना,
थर्ड में सर झुकना
इस परिवर्तन से हम खुद ही शर्म खो गए
यंहा चार साल लग गए कुछ बदलने के लिए, कुछ नहीं बदला हम ही बदल गए
सब सो रहे थे आदतन हूँ ही, उन्हें सोता देख हम भी सो गए
गाय का कॉरिडोर में आना,
गोबर कर के चले जाना
मधुमखियों का भिनभिनाना
प्रिंसिपल का चप्पल ले कर दौड़ना
टीचरों का कभी कभी पढ़ना
दोस्त की बाइक पे हम चार चार सवार हो गए
यंहा चार साल लग गए कुछ बदलने के लिए, कुछ नहीं बदला हम ही बदल गए
सब सो रहे थे आदतन हूँ ही, उन्हें सोता देख हम भी सो गए
कॉलेज में कैंपस का सपना
सीनियर्स को छोड़ कोई अपना
थ्रीड ईयर से गेट एग्जाम का प्रेशर
सिगरेट पे सिगरेट, थोड़ी सी बीयर
बुक छोड़ शिवनी से पढ़ना
परीक्षा में ख़याली पुलाव घड़ना
ख़ुशी का ठिकाना नहीं, जब आलक्लियर हो गए
एक नंबर, बेहतरीन, tasan , रोल,
क्या खायेगा छोटे, इससे मीठे बोल,
फटी में रहना, उडी में रहना
डर का फटी हो जाना
कॉन्फिडेंस का उडी हो जाना
बिना मतलब का असाइनमेंट बनाना
सेशनल्स के लिए अयोग्य से घबराना
काउंटर स्ट्राइक खेलना
विंडोज की cd जुगाड़ना
प्राइवेट नौकरी से मेरे सारे टैलेंट खो गए
संडे को टिफ़िन में पूड़ी का इंतज़ार
जीत टाकीज में फिल्म, फिर गोल बाजार
वंहा से श्रीपथ चौक तक पैदल आना
हर चीज में दो दो रूपए बचाना
कोयले का ट्रक रुकवाना,
ट्रक पे चढ़ जाना
बबलू ढाबा का खाना
और खूटा घाट में नहाना
इस रोटी कपडे की दौड़ में यार ही कंही खो गए
बस एक कमी रह गयी, फिर एक और फिर एक और
लिखने के डर से विचार ही विलुप्त हो गए

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