शिक्षक दिवस - भूपेंद्र सिंह परिहार
मिट्टी को घड़ा बनाया जिस कुंभार ने
रोया कभी तो, लगा वो पुचकारने ।
गिरा जो जमी पर तो उसने संभाला
बढ़ा जो घमंड, तो लगा दुत्कारने ।
गिलाया, सुखाया, ठोका, बजाया
जो सांचे में डाला उस लोहार ने ।
हीरे के पारखी थे मेरे गुरुजन,
जो काटा तो चमका, सारे आकाश में ।
ममता थी डाली, तो बड़ापन भी डाला
समझा के भेजा मुझे क्रूर संसार में ।
गर मेरी तरक्की से कोई जो खुश है,
सर उनका देखो, तुम चलते बाजार में ।
करी थी तपस्या और खुद ही जले थे
दिया था उजियारा उन्होंने अंधकार में ।
नमन उनको करता हूँ, मेरे गुरुजन,
माफ़ करना जो गलती की हो परिहार ने ।
- भूपेन्द्र सिंह परिहार
रोया कभी तो, लगा वो पुचकारने ।
गिरा जो जमी पर तो उसने संभाला
बढ़ा जो घमंड, तो लगा दुत्कारने ।
गिलाया, सुखाया, ठोका, बजाया
जो सांचे में डाला उस लोहार ने ।
हीरे के पारखी थे मेरे गुरुजन,
जो काटा तो चमका, सारे आकाश में ।
ममता थी डाली, तो बड़ापन भी डाला
समझा के भेजा मुझे क्रूर संसार में ।
गर मेरी तरक्की से कोई जो खुश है,
सर उनका देखो, तुम चलते बाजार में ।
करी थी तपस्या और खुद ही जले थे
दिया था उजियारा उन्होंने अंधकार में ।
नमन उनको करता हूँ, मेरे गुरुजन,
माफ़ करना जो गलती की हो परिहार ने ।
- भूपेन्द्र सिंह परिहार

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