आरक्षण - भूपेंद्र सिंह परिहार



भारत के उच्च संस्थानों की
परिजन की अभिमानो की
शिक्षा
अभी भी इतनी बेकार है
की देश में आरक्षण की दरकार है ।

एक मित्र मेरा
सिर्फ नाम लिख कर आया,
और उसका CAT का स्कोर कार्ड आया
तब मेरे पिताजी ने फ़रमाया
थोड़ा सा गुर्राया
बोले
असफलता यही सिद्ध करती है
कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया
और तू भी सिर्फ नाम लिख कर क्यों नहीं
आ गया
अब उन्हें कोन समझाए
कि पिताजी
ये नेम का नहीं, सर-नेम का खेल है
वो मेरा मित्र १२वी दो दफे फेल है
उसके पिताजी
आपके ही दफ्तर में जाते है
और शायद आपसे ज्यादा तन्खवा उठाते है
हम हर तरह से लाचार है
वो सिर्फ जाती प्रमाण पात्र पर लाचार दिखता है,
वो मेरा मित्र,
परिहार नहीं,
अहिरवार लिखता है ।
मैं भी
उसके पर-दादा पर
अत्याचार का विरोध,
जताता हूँ,
जो हुआ गलत हुआ,
संतप्त हूँ,
पछताता हूँ.
लेकिन मेरे पूर्वजो
का बदला
मुझ से क्यों,
में तो तुम्हारे साथ खेला,
एक ही थाली में खाया
उसी तालाब में नहाया
तुम्हारे दुखों में सरीक हुआ
तुम्हारे परिजनों के पैर भी छुआ
अब मुझसे ये बंधुआ मजदूरी क्यों
क्या मेरी निर्धनता तुमसे छुपी हुई है
क्या मेरी फटी शर्ट तुम्हे नहीं दिखी है
क्या रजवाड़े तोड़ नहीं दिए इस महगाई ने
मुझे पढ़ने खातिर, पापड़ बेचे मेरी माई ने
मैं तो चलो सह लूँगा
अपनी पीड़ा कविता से कह लूँगा
पर देश का क्या
क्या ये तुम्हारा नहीं है
क्या आरक्षण से साइंटिस्ट, डॉक्टर बनना सही है
क्या तुम जरुरत पर सही फैसले कर लोगे
तैतीस अंको और सत्तर अंको का अंतर भर लोगे
क्या राजनैतिक कोविंद से वज्ञानिक कलाम बन पाओगे
और अगर हा,
तो तुम सबको मेरा सदभावन
तुम खूब बढ़ो, ये देश बढे
तेरा मेरा ये द्वेष घटे
जो तुमने सहा
न कोई सहे
जो हमने सहा
न याद रहे
लेकिन ये याद जो आया तो
समय का पहिया बदलेगा
जो दबा रहा, वह उभरेगा
कोई ऊपर, कोई नीचे
अभी तुम आगे, अभी हम पीछे
यह विकट समस्या आएगी
फिर भारती पछताएगी
ये हल तो करना होगा जी

धन आधार बने आरक्षण का
माहौल बने संग्रक्षण का
न कोई काबिल पीछे हो
न कोई किसी के नीचे हो
सदभाव देश का हो ऐसा
मनवता समावृस्ट जैसा
बस राम राज्य आ जाये अब
ये आरक्षण भी हट जाये तब |

भूपेंद्र सिंह परिहार

Comments

Popular posts from this blog

इंजीनियरिंग के दिन - भूपेंद्र सिंह परिहार

कैसे बने अमीर - भूपेंद्र सिंह परिहार

कूदूं या फिर न कूदूं - भूपेंद्र सिंह परिहार