कूदूं या फिर न कूदूं - भूपेंद्र सिंह परिहार
एक अकेली वीरना से,
लड़ते लड़ते थक गई,
शत्रुओं की भरमार।
रक्त की होली खिली,
कई सर गिरे,
कई धड़ गिरे,
जब बरसी, मनु की तलवार ।
बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ?
दो दो बेटे है मेरे,
एक अश्व और एक प्राण,
दोनों से करती हूँ प्यार ।
एक क्षण सोचा,
कि पीछे मुड़ कर,
शस्त्र दाल दूँ,
दे दूँ गोरो को अधिकार ।
बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ?
हाय ! यौवन को भी अभी आना था,
गंगाधर को मर जाना था,
अब जब, जचता है श्रृंगार ।
क्या ये मेरा युद्ध नहीं है,
के सिंधिया, स्वार्थी और समृद्ध नहीं है,
मची हुई थी हाहाकार !!
बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ?
यंहा से नीचे खाई है,
उसमें भी गहराई है,
पीड़ा होगी अपरमपार ।
मुझमें तो तरुणाई है,
बंधू, प्रजा और भाई है,
क्या मृत्यु ही जीवन का सार ।
बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ?
मैंने, खून से लथपथ देखे लोग,
पराधीन, फिर कैसा भोग,
झूठी लगती है जय कार ।
मातृभूमि का ऋण तो बड़ा है,
आज चुकाने ये अश्व भी खड़ा है,
फिर मुझको क्या भय, क्या मुझको हार ।
अब शत्रु सोच रहा था,
कि कूंदें या फिर न कूंदें ।
लड़ते लड़ते थक गई,
शत्रुओं की भरमार।
रक्त की होली खिली,
कई सर गिरे,
कई धड़ गिरे,
जब बरसी, मनु की तलवार ।
बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ?
दो दो बेटे है मेरे,
एक अश्व और एक प्राण,
दोनों से करती हूँ प्यार ।
एक क्षण सोचा,
कि पीछे मुड़ कर,
शस्त्र दाल दूँ,
दे दूँ गोरो को अधिकार ।
बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ?
हाय ! यौवन को भी अभी आना था,
गंगाधर को मर जाना था,
अब जब, जचता है श्रृंगार ।
क्या ये मेरा युद्ध नहीं है,
के सिंधिया, स्वार्थी और समृद्ध नहीं है,
मची हुई थी हाहाकार !!
बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ?
यंहा से नीचे खाई है,
उसमें भी गहराई है,
पीड़ा होगी अपरमपार ।
मुझमें तो तरुणाई है,
बंधू, प्रजा और भाई है,
क्या मृत्यु ही जीवन का सार ।
बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ?
मैंने, खून से लथपथ देखे लोग,
पराधीन, फिर कैसा भोग,
झूठी लगती है जय कार ।
मातृभूमि का ऋण तो बड़ा है,
आज चुकाने ये अश्व भी खड़ा है,
फिर मुझको क्या भय, क्या मुझको हार ।
अब शत्रु सोच रहा था,
कि कूंदें या फिर न कूंदें ।
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