तिवारन
तिवारन ऑन्टी खुद को
संस्कृत का विद्वान समझती थी
मध्य प्रदेश के किसी घर बैठो डिग्री पाओ
जैसे कॉलेज से
उन्होंने मास्टर ऑफ आर्ट्स किया
जैसे किन्नरों को हर शहर की शादी पता चल जाती
ठीक वैसे ही
मेरा संस्कृत का पेपर होता
तो ना जाने उन्हें कँहा से
संस्कृत की बू आ जाती
कुछ विषय बच्चों की आत्मा पर बोझ होते है
संस्कृत मेरे लिये वही था
मेरे माता पिता पूछते
कि परीक्षा कैसी रही
तो कह देता ठीक रही
रिजल्ट से पहले रिजल्ट की पोल खोलने वाले लोग
विष्णुपुराण के हिसाब से दंड पाते है
तिवारन आती
एक-एक सवाल पूछने लगती
बालको बालका: बालकाभ्याम
बस यही तक सीमित था मेरा संस्कृत ज्ञान
जबरदस्ती कुछ संस्कृत के श्लोक सिखा दिए थे पापा ने
खैर तिवारन के पूछे हुए हर सवाल का मेरे पास गलत जवाब ही होता
जिसे मैं तो सही समझता था
वह डांटने लगती
कहती गधे हो तुम
मैं भी जानता न था
कि गधा सबसे मेहनती जानवर है
अन्यथा थोड़ा खुश हो जाता
बच्चों से ज्यादा प्रतिश्पर्धा
उनके अभिभावकों में होती है
तिवारन के तानों से मेरी मम्मी की शान में बट्टा लग रहा था
मेरी मम्मी शाम को फिर मेरी खबर लेती
तुम तो बोल रहे थे की पेपर ठीक रहा तुम्हारा
गर्मी की छुट्टी और यह असहनीय अत्याचार
तिवारन कभी-कभी अपने आपको हर विषय का विद्वान समझने लगती
एक बार तो उन्हें लगा की गणित में पांडित्य हासिल किया जाए ।
रामानुजम को गलत साबित करते हुए उन्होंने कहा
कि शून्य बटे शून्य, शून्य ही होगा
और इस सवाल को ही मूर्खतापूर्ण करार कर दिया
जो भी हो मेरी तो छुट्टी बर्बाद कर दी।
गांधी जी कहते है, पाप से घृणा करो पापी से नहीं
अब आप ही बताइये
मैं संस्कृत से घृणा करू
या तिवारन से
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