आज थे सुबह-सुबह गुवाहाटी में -अशोक चक्रधर

टिकती हुई, उठती हुई एड़ियां,
चाहती हैं आस्था की बेड़ियां!
कामाख्या मंदिर की सीढ़ियां...

बाबा लेकिन चढ़ नहीं पाता,
नीचे ही मिल जाते हैं दाता!

बाबा को द्वार के शेर
नहीं डराते हैं,
उसे मालूम है
यहां डरने वाले ही आते हैं!
भविष्यार्थी, स्वार्थी,
आत्मार्थी, चुनावार्थी!

लोकतंत्र तंत्रलोक की परिपाटी में,
आज थे सुबह-सुबह गुवाहाटी में!


-अशोक चक्रधर

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