एक अकेली वीरना से, लड़ते लड़ते थक गई, शत्रुओं की भरमार। रक्त की होली खिली, कई सर गिरे, कई धड़ गिरे, जब बरसी, मनु की तलवार । बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ? दो दो बेटे है मेरे, एक अश्व और एक प्राण, दोनों से करती हूँ प्यार । एक क्षण सोचा, कि पीछे मुड़ कर, शस्त्र दाल दूँ, दे दूँ गोरो को अधिकार । बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ? हाय ! यौवन को भी अभी आना था, गंगाधर को मर जाना था, अब जब, जचता है श्रृंगार । क्या ये मेरा युद्ध नहीं है, के सिंधिया, स्वार्थी और समृद्ध नहीं है, मची हुई थी हाहाकार !! बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ? यंहा से नीचे खाई है, उसमें भी गहराई है, पीड़ा होगी अपरमपार । मुझमें तो तरुणाई है, बंधू, प्रजा और भाई है, क्या मृत्यु ही जीवन का सार । बस सोच रही थी, की कूदूं या फिर न कूदूं ? मैंने, खून से लथपथ देखे लोग, पराधीन, फिर कैसा भोग, झूठी लगती है जय कार । मातृभूमि का ऋण तो बड़ा है, आज चुकाने ये अश्व भी खड़ा है, फिर मुझको क्या भय, क्या मुझको हार । अब शत्रु सोच रहा था, कि कूंदें या फिर न कूंदें ।